Wednesday, 3 May 2017

नौशाद साहब किसी  परिचय के मोहताज नहीं हैं  -  एक संस्मरण 

        बचपन से हुसैनगंज मोहल्ले से उनके व्यक्तित्व को निखरता देख रहा हूँ बस सुनते सुनते देखते देखते शास्त्रीय  संगीत का कुछ कुछ सीख गया माँ , सीखती थी,पिता सितार बजाते थे , बुआ सीखती थी फिर बहने सीखती थीं बस इसी से मैंने स्वर ज्ञान  प्राप्त किया। बस आखिरी बार मैंने नौशाद साहब को होटल क्लार्क्स अवध में देखा था नौशाद अकादमी की स्थापना के लिए ए थे। खासी भीड़ थी फिर भी नौशाद साहब का लखनऊ प्रेम
तो था ही उन्होंने पुछा की किसी को कुछ पूछना है? तो मैं खड़ा हो गया मुझसे बोले बताओ क्या पूछना चाहते हो? मैंने सिर्फ एक सवाल किया सर हम आपको भारत के फिल्म संगीत में  शास्त्रीय संगीत का झंडा गाड़ने वाला सूरमा समझते थे लकिन "सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान  "  देख कर निराशा हुई आपने ब्रास बैंड अपना लिया ! आज भी उनके चहरे की मुस्कान भूल नहीं पाता हूँ उन्होंने हंस कर कहा मैं जानता था की कोई मुझसे यह पूछेगा। सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान में  लड़ाइयां ही लड़ाइयां हैं वह भी अंग्रेज़ों से। उनका मार्शल म्यूजिक ब्रास बैंड  है अब तो हमारा  भी वही है परन्तु टीपू सुल्तान के ज़माने में नगाड़ा होता था किस प्रसंग में भारतीय संगीत ला सकता था। म्यूजिक डायरेक्टर थीम से बंधा होता है कोई गुंजाईश होती तो आप आज यह न कहते। फिर उन्होंने मुझे बुलाया और एकांत  में मेरा परिचय पुछा और अतीत में खो गए और बोले पुत्तीलाल नहीं आया ? मैंने कहा सर उनका देहांत हो चूका है।  एक बार उन्होंने अपनी आँखों से छलकते आंसू के कतरे को पोंछा और मुझ गले लगा कर चले गए। क्या पता था की शास्त्रीय संगीत को जान साधारण के लिए सुलभ बनाने वाला इसके बाद मुझे कभी नहीं मिलेगा। उनका संगीत आज भी अमर है।